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इश्क़: लाज़मी है

( आयतें - Lines which are sacrosanct/from Quran, मिसरे - Lines, सफहा - Page) खुल जाऊँ मैं या खुल जाए तू कभी पढ़ ले आयतें कुरेदी थी जो हमने हर कोने पे बदन के उँगलियों के फेर से; समझ के माने आज़ाद हो जाएँ फिर गलतफहमियों के बोझ से | वो मिसरे की जिनमें मेरे ख़्वाबों की लंबी लिस्ट समेट ली थी तुमने अपनी आँखों की पुतलियों पर, सुपुर्द कर देना मेरे; ऐवज़ में उनके मैं वो आयतें दे दूंगा तुम्हे जिनमें ना बिछड़ने की कसमें खायी थी तुमने | लिख बैठेंगे कुछ नया भी गर नाराज़ ना हुई तुम फिर से, की कोरे सफहों की मायूसी से बददुआएँ लगती है, सुना है | दर्द लाज़मी है इश्क़ में, बिछड़ना भी की कहाँ मुट्ठियाँ भिंचने से रेत रुकी है कभी; लाज़मी नहीं गर कुछ इश्क़ में तो बिछड़े आशिक़ों का दोबारा मिले बिना ही मर जाना |

ग़ुमशुदा

चहलकदमी करते थोड़ी दूर निकल आया हूँ की लौट पाना यहाँ से मुमकिन नहीं लगता | रास्ते सर्पिल हैं थोड़े शरारती भी, जिंदगी की तर्ज़ पर दोराहे में बँट जा रहे अक्सर; मैं भौहें सिकुड़ने नहीं देता मगर की भटका समझ रास्ते भी उत्श्रृंखल हो जाते हैं मुड़ जाते हैं कहीं से भी | किसी से पता पूछ भी नहीं सकता मखौल न बन जाऊं शहर का, की अधेड़ उम्र वाला इंसान एक रास्ता पूछता फिर रहा है बच्चों की तरह अंदेशा यह भी लगा है की देर हो गयी गर कोई गुमशुदगी की रपट न लिखवा दे थाने में की कहाँ इस उम्र में पुलिसिया चक्कर काटूँगा मैं | कोई पुरानी फोटो पोस्टरों पे चिपका के इनाम न डाल दे ढूंढने वालों पे की कहाँ इस उम्र में ये शर्मिंदगी झेलूंगा मैं | याद नहीं कबसे इसी पसोपेश में खड़ा हूँ यहाँ; सोचता हूँ चले चलता हूँ अनजाना मोड़ कोई दे पटकनी खुद ही पहुँचा देगा घर पे; बहरहाल यह भी देख लूँ तथाकथित अपनों में आखिर कौन ढूंढने निकलता है मुझे ||

तुम आओगी न!

( नैनों-नक्श = facial features, नर्गिसी = resembling Daffodil flower) याद है तुम्हें कुछ क्यारियाँ खींची थी तुमने बागीचे में गुलमोहर के पेड़ तले तुम्हारे नैनों-नक्श और खुश्बू वाले नर्गिसी फूल उग आये हैं उनमें पूछते हैं कई दफ़ा तुम्हारे बारे में जिक्र सुनते हैं, बड़े मिजाज से किसी शायर की ग़ज़लों की तरह फरमाईशें करते हैं तुम्हें बुलाने की ज़िद करते खिड़कियों पे चढ़ आते हैं  कई बार हवा के झोकों से शह लेकर, फुसफुसा जाते हैं "तुम भी बुलाओ न" समझा पाता नहीं, रिश्ता वो नहीं अब की तुम्हें पुकार सकूँ तसल्ली होती है पर उन्हें भी, मुझे भी गर मैं तुम्हें पुकारता हूँ क्या आओगी तुम जो कभी वक़्त मिले की ये फूल भी हठ कर बैठें हैं तुम्हारे नैनों-नक्श और खुश्बू वाले फूल उग आयें हैं तुम्हारी कब्र पे इस बार तुम आओगी न!

उद्विग्न मन

(उद्विग्न = anxious , सोखता = to absorb , जोखता = to weigh , अस्वीकार्य = unacceptable, कृत्य =  act,  यत्न = effort) उद्विग्न मन तेरा भी (उद्विग्न - उद्विग्न मन मेरा भी कुछ बात पे हैरान है ये किसी बात से परेशान है ये कुछ सोचता, फिर सोखता उस बात को फिर जोखता जो तौल पाता है उसे उस बात की हैवानियत से शर्मसार मन तेरा भी, शर्मसार मन मेरा भी | किसी बात से चिंतित है ये और तनिक भयभीत भी क्या करूँ ये सोचता कुछ कर सकूँ,मन कचोटता जो बेबसी की आड़ में खूबसूरत इस संसार में अस्वीकार्य इस कृत्य से मैं किनारा कर गया उस बेबसी के भार से तार तार मन तेरा भी, तार तार मन मेरा भी | कह रहा हठ बार बार हो जायेगा, कर प्रहार जो किया मन से प्रयास तो कैसी जीत, काहे का हार दहाड़ती, उन चीखों की लाज़ रख, बस एक बार जो लाज़ रख पाता कभी उस बात की इंसानियत से, होता गौरवान्वित सौ बार मन तेरा भी, सौ बार मन मेरा भी | कौन कहता है नहीं संघर्ष की कोई जीत है चल उठ खड़ा हो, देख तो झूठ खुद भयभीत है जो अब नहीं तो फिर कभी हो पायेगा ये यत्न भी जो एक तिनका हिल गया हिल जायेगा कण-कण सभी...

सवाल

तेरे सवाल, मेरे सवाल कुछ सीधे, कुछ संझे हुए कुछ कच्चे, कुछ मंझे हुए पूछे जाने की बाट जोहते, पंक्तिबद्ध खड़े, बेचैन सवाल उन सवालों पर भी सवाल उनके जवाबों पर भी सवाल थके मांदे, हारे पड़े, पूछे जाने से भयभीत, विचलित सवाल अतीत की छेडखानियों से लज्जित सवाल, कुछ मुर्झाये, कुछ बिखरे पड़े पलकों पे कुछ के दुखड़े जड़े क्या पूछ लेगा कब कोई, इस बात से चिंतित संकुचित सवाल हमारी कथनी-करनी, चाल-चरित्र सब पर सवाल अविश्वास के इस माहौल में, हाड़ मांस के हर प्राणी पर सवाल  जो पूछ पाता मैं कभी, तो पूछता मैं बस यही  सवालों पे हक फिर किसका जब मैं सवाल, जब तुम सवाल |

हाँ मैं लिखता हूँ

हाँ मैं लिखता हूँ लेखक नहीं, शायर नहीं पर मैं लिखता हूँ | टूटे फूटे शब्दों में टूटी फूटी भाषा में कोई पढ़ ले मेरी नज्मों को एक ऐसी बहकी आशा से हाँ मैं लिखता हूँ | अपनों पर लिखता हूँ सपनों पर लिखता हूँ शहर, गाँव, भावनाओं पर लिखता हूँ कुछ ना मिले तो अपने लिखने पर लिखता हूँ पर मैं लिखता हूँ | शब्दों को बड़ी मुश्किल से डिक्शनरी के पन्नों से ढूंढकर, उन्हें लाइनओं में फिट बिठा अपने लिखने के सपने को  साकार करता हूँ सच बोलूँ तो लिखने की आड़ में खिलवाड़ करता हूँ  पर मैं लिखता हूँ | शायद इसलिए की संवेदनाएँ हैं कुछ कोई समझ जाता जिन्हें  बिन कहे मेरे, तो  इक  सुकून होता | कोई पढता नहीं, समझता नहीं फिर भी मैं लिखता हूँ समझेगा कोई अगली बार  शायद इस आस में लिखता हूँ पर मैं लिखता हूँ | लेखक नहीं, शायर नहीं पर मैं लिखता हूँ ||

मैं 26 का हो चूका हूँ

मैं 26 का हो चूका हूँ बैचेलर हूँ, पढाई करता हूँ | लोग कहते हैं, मुझे अब एक नौकरी ढूँढ लेनी चाहिए शादी करके सेटल हो जाना चाहिए हाँलाकि सेटल होने का मतलब, मैं कभी समझ नहीं पाता | हाँ मैं २६ का हो चूका हूँ लोग कहते हैं, बचकानी हरकतें मुझे अब शोभा नहीं देती हर बात पे माँ को पुकारना अच्छा नहीं लगता मुझे अब अपने पैरों पर खड़ा हो जाना चाहिए हाँलाकि 'पैरों पर खड़ा होना' मैं कभी समझ नहीं पाता | हाँ मैं २६ का हो चूका हूँ लोग कहते हैं, इस उम्र में एक गाड़ी तो बनती है किसी सोसाइटी के इक्कीसवें माले पे एक 2 BHK फ्लैट तो बनता है मुझे अगली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणाश्रोत बनना चाहिए हाँलाकि गाड़ी-बंगले से प्रेरणा का मतलब, मैं कभी समझ नहीं पाता | हाँ मैं २६ का हो चूका हूँ एक तिहाई ज़िन्दगी बीत चुकी है पर लगता है, मैं २६ के क़ाबिल नहीं वरना इसका बोझ इतना भारी न लगता |