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कहानी - मौलवी साहेब

सलामपुर में हमारे किराये वाले मकान के दो माले नीचे ग्राउंड फ्लोर पर मौलवी साहेब रहते थे | अपने तीन बेटे, २ बहुएँ, २ पोते और आधे दर्ज़न बकरियों के साथ रहने वाले मौलवी साहेब को अगर किसी चीज़ का शौक़ था, तो सुनने का | कुछ भी सुन लेते थे, कुमार सानू के गाने, चौराहे के पनवारी की उधार में खाये धोखों के किस्से, सुनील के मैट्रिक के परीक्षा में चौथी बार फेल होने में उसके टीचरों की मिलीभगत, अपनी बकरियों के भूखे होने पर मिमियाने के आवाज़ें और वो सब कुछ जिसे हम आप सुनकर अनसुना कर दें | आँखें नहीं थी उनकी, शायद इसलिए जो बात हम चेहरे के भावों से पढ़ते हैं उन्हें वो आवाज़ की कम्पन से पढ़ने की कोशिश करते थे | इसलिए शायद बड़ी गंभीरता से हर एक शब्द सुनते थे और कुछ कम सुनने पर 'माफ़ कीजियेगा' कहकर दुबारा दुहराने को कहते थे | उनकी इन्ही आदतों ने उन्हें मोहल्ले का वो पादरी बना दिया था जिसके पास हम अपनी कारस्तानियां सुनाने जाते हैं | हालांकि यहाँ ज्यादातर लोग अपनी तरफदारी और दूसरों की शिकायतें सुनाने आते थे | मौलवी साहेब फिर भी सब सुनते थे | कोई फैसला या सलाह नहीं देते, बस मिजाज से सुनते थे | कई लोग म...

तहज़ीब

तहज़ीब, तमीज मर्यादा, दहलीज़ और अपनी पेचीदगी में उलझे तमाम वो लफ्ज़ जिससे किसी खानदान की इज़्ज़त बयां होती है औरतों के हवाले गुड्डे गुड्डियाँ, काजल, मेहँदी, आँचल और अपनी नज़ाकत में लिपटे तमाम वो सिफ़त ( सिफ़त - स्वभाव ) जिससे वो नाज़ुक दिखे अबला और भावुक दिखे इस्तेमाल होंगी केवल औरतों के लिए स्कूल, किताब तालीम, खिताब और काबिल दिखने की कोशिश में उठे तमाम वो कदम जिनपे उनका अधिकार नहीं ऐसे सारे क़दमों को जिससे उनका सरोकार नहीं उठने से पहले रोकना होगा औरतों को   ख्वाहिश, खुदगर्ज़ी अभिलाषा, मनमर्ज़ी और आज़ादी की तमन्ना में घुले तमाम वो ख्याल उठ सकती घर की आबरू पे जिनसे कोई सवाल       ऐसे अश्लील ख्यालों से दूर रहना फ़र्ज़ होगा औरतों का रस्मो-रिवाज़ शर्मो-हया, घूँघट, हिज़ाब मांगे जाने पे हर बात का वाजिब जवाब और हर वो नियम जिनका आयतों में जिक्र है ( आयतें - कुरान की पंक्तियाँ ) गर आबरू की फ़िक्र है अमल करना होगा औरतों को ऐवज़ में इन...

शिकायत

शिकायत की थी मैंने चंद दिनों पहले तुम्हारे ज़ुबान से फिसले उर्दू की इक लफ्ज़ पर की जिसमे तुमने ज़ुबान की जगह जुबान कहा था | शिकायत की थी मैंने नुक्तों की अहमियत नहीं तुम्हे ( नुक्ता - उर्दू शब्दों में नीचे चिन्हित बिंदु ) नकार देती हो अक्सर, यों रिश्तों की बारीकियों को बदल जाते हैं माने शब्दों के तुम्हारी इस नादानी से शिकायत यूँ भी थी ज़ुबाँ साफ़ नहीं तुम्हारी हर्फ़ फूटते नहीं वाज़िब ( हर्फ़ - अक्षर) गरारे करो जो गर ( गरारा - गलगला ) सुबहे गुनगुने पानी से, तलफ़्फ़ुज़ निखर आए शायद ( तलफ़्फ़ुज़ - उच्चारण ) पलट कर बड़ी अदब से फ़रमाया था तुमने ज़ुबाँ साफ़ नहीं ना सही शब्द चुभते नहीं मुसल्सल ( मुसल्सल - अक्सर/हमेशा) बिन माँगे, बेमतलब मेरे तल्ख़ मशवरों की तरह ( तल्ख़ - कड़वा ) इक कसक सी दबी थी जेहन में तबसे तुम्हारे ग़रारों ने आज याद दिलाया है, बहुत सोच कर तुम्हारी बात पर मैंने शब्दों से ज्यादा उनके मानो पे तवज्जो देने का मन बनाया है |

इश्क़: लाज़मी है

( आयतें - Lines which are sacrosanct/from Quran, मिसरे - Lines, सफहा - Page) खुल जाऊँ मैं या खुल जाए तू कभी पढ़ ले आयतें कुरेदी थी जो हमने हर कोने पे बदन के उँगलियों के फेर से; समझ के माने आज़ाद हो जाएँ फिर गलतफहमियों के बोझ से | वो मिसरे की जिनमें मेरे ख़्वाबों की लंबी लिस्ट समेट ली थी तुमने अपनी आँखों की पुतलियों पर, सुपुर्द कर देना मेरे; ऐवज़ में उनके मैं वो आयतें दे दूंगा तुम्हे जिनमें ना बिछड़ने की कसमें खायी थी तुमने | लिख बैठेंगे कुछ नया भी गर नाराज़ ना हुई तुम फिर से, की कोरे सफहों की मायूसी से बददुआएँ लगती है, सुना है | दर्द लाज़मी है इश्क़ में, बिछड़ना भी की कहाँ मुट्ठियाँ भिंचने से रेत रुकी है कभी; लाज़मी नहीं गर कुछ इश्क़ में तो बिछड़े आशिक़ों का दोबारा मिले बिना ही मर जाना |

ग़ुमशुदा

चहलकदमी करते थोड़ी दूर निकल आया हूँ की लौट पाना यहाँ से मुमकिन नहीं लगता | रास्ते सर्पिल हैं थोड़े शरारती भी, जिंदगी की तर्ज़ पर दोराहे में बँट जा रहे अक्सर; मैं भौहें सिकुड़ने नहीं देता मगर की भटका समझ रास्ते भी उत्श्रृंखल हो जाते हैं मुड़ जाते हैं कहीं से भी | किसी से पता पूछ भी नहीं सकता मखौल न बन जाऊं शहर का, की अधेड़ उम्र वाला इंसान एक रास्ता पूछता फिर रहा है बच्चों की तरह अंदेशा यह भी लगा है की देर हो गयी गर कोई गुमशुदगी की रपट न लिखवा दे थाने में की कहाँ इस उम्र में पुलिसिया चक्कर काटूँगा मैं | कोई पुरानी फोटो पोस्टरों पे चिपका के इनाम न डाल दे ढूंढने वालों पे की कहाँ इस उम्र में ये शर्मिंदगी झेलूंगा मैं | याद नहीं कबसे इसी पसोपेश में खड़ा हूँ यहाँ; सोचता हूँ चले चलता हूँ अनजाना मोड़ कोई दे पटकनी खुद ही पहुँचा देगा घर पे; बहरहाल यह भी देख लूँ तथाकथित अपनों में आखिर कौन ढूंढने निकलता है मुझे ||

तुम आओगी न!

( नैनों-नक्श = facial features, नर्गिसी = resembling Daffodil flower) याद है तुम्हें कुछ क्यारियाँ खींची थी तुमने बागीचे में गुलमोहर के पेड़ तले तुम्हारे नैनों-नक्श और खुश्बू वाले नर्गिसी फूल उग आये हैं उनमें पूछते हैं कई दफ़ा तुम्हारे बारे में जिक्र सुनते हैं, बड़े मिजाज से किसी शायर की ग़ज़लों की तरह फरमाईशें करते हैं तुम्हें बुलाने की ज़िद करते खिड़कियों पे चढ़ आते हैं  कई बार हवा के झोकों से शह लेकर, फुसफुसा जाते हैं "तुम भी बुलाओ न" समझा पाता नहीं, रिश्ता वो नहीं अब की तुम्हें पुकार सकूँ तसल्ली होती है पर उन्हें भी, मुझे भी गर मैं तुम्हें पुकारता हूँ क्या आओगी तुम जो कभी वक़्त मिले की ये फूल भी हठ कर बैठें हैं तुम्हारे नैनों-नक्श और खुश्बू वाले फूल उग आयें हैं तुम्हारी कब्र पे इस बार तुम आओगी न!

उद्विग्न मन

(उद्विग्न = anxious , सोखता = to absorb , जोखता = to weigh , अस्वीकार्य = unacceptable, कृत्य =  act,  यत्न = effort) उद्विग्न मन तेरा भी (उद्विग्न - उद्विग्न मन मेरा भी कुछ बात पे हैरान है ये किसी बात से परेशान है ये कुछ सोचता, फिर सोखता उस बात को फिर जोखता जो तौल पाता है उसे उस बात की हैवानियत से शर्मसार मन तेरा भी, शर्मसार मन मेरा भी | किसी बात से चिंतित है ये और तनिक भयभीत भी क्या करूँ ये सोचता कुछ कर सकूँ,मन कचोटता जो बेबसी की आड़ में खूबसूरत इस संसार में अस्वीकार्य इस कृत्य से मैं किनारा कर गया उस बेबसी के भार से तार तार मन तेरा भी, तार तार मन मेरा भी | कह रहा हठ बार बार हो जायेगा, कर प्रहार जो किया मन से प्रयास तो कैसी जीत, काहे का हार दहाड़ती, उन चीखों की लाज़ रख, बस एक बार जो लाज़ रख पाता कभी उस बात की इंसानियत से, होता गौरवान्वित सौ बार मन तेरा भी, सौ बार मन मेरा भी | कौन कहता है नहीं संघर्ष की कोई जीत है चल उठ खड़ा हो, देख तो झूठ खुद भयभीत है जो अब नहीं तो फिर कभी हो पायेगा ये यत्न भी जो एक तिनका हिल गया हिल जायेगा कण-कण सभी...