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मैं मेरी तनख़्वाह नहीं हूँ

मैं मेरी तनख़्वाह नहीं हूँ मेरी कॉलेज की डिग्री, कद-काठी, चमड़ी का रंग नहीं मेरी गर्दन पर छिपती उभरती खुदकुशी के निशां वीसा के स्टैम्प ट्विटर हैंडल आधार के १२ अंक जात, मजहब दूर दूर नहीं जो कौतुहल हो मुझे जानने की तुम मुझे मेरी कविता मान लो उन्ही की तरह स्वछन्द हूँ मैं उनके शब्दों के बीच छुपे सैंकड़ों मतलब उन मतलबों के बीच का अंतर्द्वंद हूँ मैं छुपी होंगी उन्हीं लाइनों में खुद मेरा सारांश भी जो ढूंढ पाओगे तुम मेरी ही किसी कविता का एक छंद हूँ मैं जो मुश्ताक़ हो तुम, जानना हो मुझे तुम मुझे मेरी कहानियाँ मान लो उन्ही की तरह मनगढंत हूँ मैं कहानियों में बसे सैंकड़ो किरदार उन्हीं किरदारों का अंश हूँ मैं छुपी है काल्पनिक उन कहानियों में मेरे जीवन के किस्से जो समझ जाओगे तुम मेरी ही कहानियों का एक अंक हूँ मैं गर तुम्हें लेबल डालने की ज़िद हो तुम मुझे एक लेखक मान लो उस सनकी भीड़ का एक अंश हूँ मैं आम तौर पे मोहब्बत की लौ हूँ क्रान्ति पथ पर विध्वंस हूँ मैं हुकूमत की गिरेबां में झाकते हर शब्द मेरे जो भा...

कहानी - सल्फास

बारिश आज भी झांसा दे गयी | मंगरु अपने पौने २ कट्ठे खेत की मेढ़ पर बैठ अलसाई नज़रों से कभी अपने सूखती फसलों को देखता तो कभी उँगलियों की टोपी बना आसमाँ की तरफ | अगस्त का महीना आ चुका था लेकिन बारिश की दूर दूर तक कोई खबर नहीं | मंगरु ने नज़र घुमाई तो अखबार के फटे हुए एक टुकड़े पे गयी | बड़े साफ़ मोटे अक्षरों में लिखा था 'किसानों का 35 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ माफ़' | मंगरु ने अखबार का टुकड़ा तह कर अपनी जेब में डाला और घर की तरफ दोपहर का खाना खाने निकल पड़ा | शाम ढले अपने पडोसी सुखीराम से उसके बेटे को दिल्ली में फ़ोन कराया | सुखीराम का बेटा दिल्ली में बैंक परीक्षा की तैयारी करता था और गांव के होशियारों में शुमार था | पता चला की क़र्ज़ माफ़ी केवल बैंक से लिए कर्ज़ों पर है | मंगरु ने तो महाजन से पैसे लिए थे, तीन टका महीने के ब्याज पर | मंगरु को अपने तंग हालत से बहार आने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था | पिछले चंद दिनों में उसने ईंट भट्टी से लेकर मनरेगा तक हर जगह काम ढूंढने की कोशिश की, मगर कहीं काम ना बना | महाजन के सूध के पैसे भी बढ़े जा रहे थे | मंगरु इन्ही स...

रास्ते बदले हैं कभी?

रास्ते बदले हैं कभी? इस डर से की तंग इक गली में चंद लोग रहते हैं जो राह गुजरते पूछ बैठते हैं हाल चाल अक्सर | वक़्त वही, अंदाज़ वही चेहरा वही, अलफ़ाज़ वही, फ़िक्र्मन्दगी की आड़ में सवालों के बाण तैयार, हर सवाल यक़्साँ फरेबी (यक़्साँ - एक जैसे) हर सवाल इक बलात्कार | कभी किसी मसले का हल होता नहीं देखा इस संवाद से ना तल्खियां मिटती मोहल्ले की ना जड़ मिटते फसाद के | मंसूबे जो समझ नहीं पाता सवालों में छुपे सवाल का नामुनासिब कुछ कह जाता हूँ मच जाता अक्सर बवाल सा | वहीं दूसरी इक गली में जो और भी संकरी है मोहल्ले के मनुवादी जिसे अछूतों की टोली बता दुत्कार देते हैं | यों तो क्रांतियों वाला ज़ज्बा नहीं, मुँह चिढ़ाने के इरादे सही उसी गली से गुजर हम भी अपने प्रतिष्ठित मोहल्ले को ललकार लेते हैं | अधमरे एक नाले के दोनों तरफ आधे कमरे, छह बसैरों वाली अनगिनत घरें बिछीं हैं बेधुले कपड़ो की गठरी सी, कुछ खाट धुप सेकते इंसानो के साथ बेसुध पड़े सड़क के नाम पर धुरमुसा रास्ता इक पत्थरी सी हिदायतें ना गुजरने की  ता...

ग़ज़ल

मंदिर मस्जिद की आग में इंसान  क्यों जलाते हैं |   आओ अपने अपने दिल में पहले इक राम बसाते हैं | मशालों की जरुरत नहीं तख्ता पलटने के लिए  कुछ शब्द चुनते है, दुष्यंत सी कविता बनाते हैं | नज़र घुमाओ जिधर, गर तुम्हे सब चोर दीखते हैं आओ अपने अपने घर में इक आइना लगाते हैं सच का फासला दो  चार कदम बस   और है      आपने पी भी नहीं, फिर क्यों लड़खड़ाते हैं |        तमन्ना हो तुम्हे जो फैज़ फ़राज़ सा नामवर होने की आओ जरा   उनकी काटों भरी जीवनी पढ़ जाते हैं | क्रांतियों को मुकम्मल होने में गुजर जाते हैं बरसों   इक काम करते हैं, आज एक पौधा लगाते हैं |      परेशान जो तुम हालात देख सीरिया की, रोहिंग्या की आओ अपने घरों के आगे एक प्याऊ बनाते हैं | ये जो ज़िद पे हो बैठे दुनिया बदलने की आओ घर लौट चलें, इक दिया जलाते हैं | ( नामवर - प्रतिष्ठित )

कहानी - मौलवी साहेब

सलामपुर में हमारे किराये वाले मकान के दो माले नीचे ग्राउंड फ्लोर पर मौलवी साहेब रहते थे | अपने तीन बेटे, २ बहुएँ, २ पोते और आधे दर्ज़न बकरियों के साथ रहने वाले मौलवी साहेब को अगर किसी चीज़ का शौक़ था, तो सुनने का | कुछ भी सुन लेते थे, कुमार सानू के गाने, चौराहे के पनवारी की उधार में खाये धोखों के किस्से, सुनील के मैट्रिक के परीक्षा में चौथी बार फेल होने में उसके टीचरों की मिलीभगत, अपनी बकरियों के भूखे होने पर मिमियाने के आवाज़ें और वो सब कुछ जिसे हम आप सुनकर अनसुना कर दें | आँखें नहीं थी उनकी, शायद इसलिए जो बात हम चेहरे के भावों से पढ़ते हैं उन्हें वो आवाज़ की कम्पन से पढ़ने की कोशिश करते थे | इसलिए शायद बड़ी गंभीरता से हर एक शब्द सुनते थे और कुछ कम सुनने पर 'माफ़ कीजियेगा' कहकर दुबारा दुहराने को कहते थे | उनकी इन्ही आदतों ने उन्हें मोहल्ले का वो पादरी बना दिया था जिसके पास हम अपनी कारस्तानियां सुनाने जाते हैं | हालांकि यहाँ ज्यादातर लोग अपनी तरफदारी और दूसरों की शिकायतें सुनाने आते थे | मौलवी साहेब फिर भी सब सुनते थे | कोई फैसला या सलाह नहीं देते, बस मिजाज से सुनते थे | कई लोग म...

तहज़ीब

तहज़ीब, तमीज मर्यादा, दहलीज़ और अपनी पेचीदगी में उलझे तमाम वो लफ्ज़ जिससे किसी खानदान की इज़्ज़त बयां होती है औरतों के हवाले गुड्डे गुड्डियाँ, काजल, मेहँदी, आँचल और अपनी नज़ाकत में लिपटे तमाम वो सिफ़त ( सिफ़त - स्वभाव ) जिससे वो नाज़ुक दिखे अबला और भावुक दिखे इस्तेमाल होंगी केवल औरतों के लिए स्कूल, किताब तालीम, खिताब और काबिल दिखने की कोशिश में उठे तमाम वो कदम जिनपे उनका अधिकार नहीं ऐसे सारे क़दमों को जिससे उनका सरोकार नहीं उठने से पहले रोकना होगा औरतों को   ख्वाहिश, खुदगर्ज़ी अभिलाषा, मनमर्ज़ी और आज़ादी की तमन्ना में घुले तमाम वो ख्याल उठ सकती घर की आबरू पे जिनसे कोई सवाल       ऐसे अश्लील ख्यालों से दूर रहना फ़र्ज़ होगा औरतों का रस्मो-रिवाज़ शर्मो-हया, घूँघट, हिज़ाब मांगे जाने पे हर बात का वाजिब जवाब और हर वो नियम जिनका आयतों में जिक्र है ( आयतें - कुरान की पंक्तियाँ ) गर आबरू की फ़िक्र है अमल करना होगा औरतों को ऐवज़ में इन...

शिकायत

शिकायत की थी मैंने चंद दिनों पहले तुम्हारे ज़ुबान से फिसले उर्दू की इक लफ्ज़ पर की जिसमे तुमने ज़ुबान की जगह जुबान कहा था | शिकायत की थी मैंने नुक्तों की अहमियत नहीं तुम्हे ( नुक्ता - उर्दू शब्दों में नीचे चिन्हित बिंदु ) नकार देती हो अक्सर, यों रिश्तों की बारीकियों को बदल जाते हैं माने शब्दों के तुम्हारी इस नादानी से शिकायत यूँ भी थी ज़ुबाँ साफ़ नहीं तुम्हारी हर्फ़ फूटते नहीं वाज़िब ( हर्फ़ - अक्षर) गरारे करो जो गर ( गरारा - गलगला ) सुबहे गुनगुने पानी से, तलफ़्फ़ुज़ निखर आए शायद ( तलफ़्फ़ुज़ - उच्चारण ) पलट कर बड़ी अदब से फ़रमाया था तुमने ज़ुबाँ साफ़ नहीं ना सही शब्द चुभते नहीं मुसल्सल ( मुसल्सल - अक्सर/हमेशा) बिन माँगे, बेमतलब मेरे तल्ख़ मशवरों की तरह ( तल्ख़ - कड़वा ) इक कसक सी दबी थी जेहन में तबसे तुम्हारे ग़रारों ने आज याद दिलाया है, बहुत सोच कर तुम्हारी बात पर मैंने शब्दों से ज्यादा उनके मानो पे तवज्जो देने का मन बनाया है |