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इश्क़: प्रैक्टिकल वाला

अगस्त का पहला इतवार दोपहर के साढ़े तीन बजे काले घने बादलों में दिन कहीं ढक सा गया है सड़कें बारिश में वीरान सबकुछ मानो थम सा गया है घर की पोर्च पर मैं चाय की चुस्कियों के साथ अमृता प्रीतम की आत्मकथा के घूँट लगाता किताब के ४४वें पन्ने पर पहुँचता हूँ अमृता साहिर के लिए कहती हैं "तेरा मिलना ऐसा होता है जैसे कोई हथेली पर एक वक़्त की रोटी रख दे" इस मार्मिक प्रेम कथा से प्रभावित भीगती वीरान सड़कों पर बारिश में काल्पनिक फिल्म का सेट लगा देता हूँ मेरे कुशल निर्देशन में साहिर अमृता को मिलाने की कवायद शुरू होती है किसी सपने की तरह साहिर भीगते हुए धीमे क़दमों से अमृता की तरफ बढ़ते हैं एकटक उन्हें देखते हुए दोनों हाथ अपने हाथों में थामकर कुछ कहने को होंठ फड़फड़ाते हैं इक अनचाही आवाज़ से लेकिन सपना टूट जाता है बेमन से फ़ोन पर नज़रें फेरता हूँ बॉस का व्हाट्सएप्प: "कैन यू रीच ऑफिस इन हाफ ऍन ऑवर" आशिक़ मन झुंझलाता है ये वक़्त नहीं इन बेतुकी बातों का अभी इतिहास बन रहा है दो प्रेमी जो दशकों से न मिल पाए, एक होने जा रहे हैं...

स्वेटर

कल बारिश हुई अक्टूबर की पहली सर्द हवाओं की पहली झोंक में जब सिहरता देख मुझे उँगलियाँ तुम्हारी ऊन के गोलों पे तेज हो जाती थी चाय के प्यालों की खनक दूर से सुनकर तलब तुम्हारे गर्माहट की मीरे सीने में भर आती थी बादलों में टंगे सूरज की किरणें हिचकिचाते हुए नंगे ठूठ पेड़ों से गुजरकर ख़ुश्क हमारे बदन को सहला जाती थी कल फिर वही बारिश थी पतझड़ की पहली सिहरता रहा मैं तीसरे पहर रात के कुछ हरारत में ( हरारत - हल्का बुखार ) कुछ बनावटी, आँखें मूँद इंतजार में लिपट जाने को गर्म साँसों में तुम्हारे पड़े हैं गोले उलझे रिश्तों के, झाँकते बंद अलमीरों से स्वेटर जो बुन दो तुम फिर इक बार ओढ़ लूँ उसे सो जाऊँ मैं |

मैं मेरी तनख़्वाह नहीं हूँ

मैं मेरी तनख़्वाह नहीं हूँ मेरी कॉलेज की डिग्री, कद-काठी, चमड़ी का रंग नहीं मेरी गर्दन पर छिपती उभरती खुदकुशी के निशां वीसा के स्टैम्प ट्विटर हैंडल आधार के १२ अंक जात, मजहब दूर दूर नहीं जो कौतुहल हो मुझे जानने की तुम मुझे मेरी कविता मान लो उन्ही की तरह स्वछन्द हूँ मैं उनके शब्दों के बीच छुपे सैंकड़ों मतलब उन मतलबों के बीच का अंतर्द्वंद हूँ मैं छुपी होंगी उन्हीं लाइनों में खुद मेरा सारांश भी जो ढूंढ पाओगे तुम मेरी ही किसी कविता का एक छंद हूँ मैं जो मुश्ताक़ हो तुम, जानना हो मुझे तुम मुझे मेरी कहानियाँ मान लो उन्ही की तरह मनगढंत हूँ मैं कहानियों में बसे सैंकड़ो किरदार उन्हीं किरदारों का अंश हूँ मैं छुपी है काल्पनिक उन कहानियों में मेरे जीवन के किस्से जो समझ जाओगे तुम मेरी ही कहानियों का एक अंक हूँ मैं गर तुम्हें लेबल डालने की ज़िद हो तुम मुझे एक लेखक मान लो उस सनकी भीड़ का एक अंश हूँ मैं आम तौर पे मोहब्बत की लौ हूँ क्रान्ति पथ पर विध्वंस हूँ मैं हुकूमत की गिरेबां में झाकते हर शब्द मेरे जो भा...

कहानी - सल्फास

बारिश आज भी झांसा दे गयी | मंगरु अपने पौने २ कट्ठे खेत की मेढ़ पर बैठ अलसाई नज़रों से कभी अपने सूखती फसलों को देखता तो कभी उँगलियों की टोपी बना आसमाँ की तरफ | अगस्त का महीना आ चुका था लेकिन बारिश की दूर दूर तक कोई खबर नहीं | मंगरु ने नज़र घुमाई तो अखबार के फटे हुए एक टुकड़े पे गयी | बड़े साफ़ मोटे अक्षरों में लिखा था 'किसानों का 35 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ माफ़' | मंगरु ने अखबार का टुकड़ा तह कर अपनी जेब में डाला और घर की तरफ दोपहर का खाना खाने निकल पड़ा | शाम ढले अपने पडोसी सुखीराम से उसके बेटे को दिल्ली में फ़ोन कराया | सुखीराम का बेटा दिल्ली में बैंक परीक्षा की तैयारी करता था और गांव के होशियारों में शुमार था | पता चला की क़र्ज़ माफ़ी केवल बैंक से लिए कर्ज़ों पर है | मंगरु ने तो महाजन से पैसे लिए थे, तीन टका महीने के ब्याज पर | मंगरु को अपने तंग हालत से बहार आने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था | पिछले चंद दिनों में उसने ईंट भट्टी से लेकर मनरेगा तक हर जगह काम ढूंढने की कोशिश की, मगर कहीं काम ना बना | महाजन के सूध के पैसे भी बढ़े जा रहे थे | मंगरु इन्ही स...

रास्ते बदले हैं कभी?

रास्ते बदले हैं कभी? इस डर से की तंग इक गली में चंद लोग रहते हैं जो राह गुजरते पूछ बैठते हैं हाल चाल अक्सर | वक़्त वही, अंदाज़ वही चेहरा वही, अलफ़ाज़ वही, फ़िक्र्मन्दगी की आड़ में सवालों के बाण तैयार, हर सवाल यक़्साँ फरेबी (यक़्साँ - एक जैसे) हर सवाल इक बलात्कार | कभी किसी मसले का हल होता नहीं देखा इस संवाद से ना तल्खियां मिटती मोहल्ले की ना जड़ मिटते फसाद के | मंसूबे जो समझ नहीं पाता सवालों में छुपे सवाल का नामुनासिब कुछ कह जाता हूँ मच जाता अक्सर बवाल सा | वहीं दूसरी इक गली में जो और भी संकरी है मोहल्ले के मनुवादी जिसे अछूतों की टोली बता दुत्कार देते हैं | यों तो क्रांतियों वाला ज़ज्बा नहीं, मुँह चिढ़ाने के इरादे सही उसी गली से गुजर हम भी अपने प्रतिष्ठित मोहल्ले को ललकार लेते हैं | अधमरे एक नाले के दोनों तरफ आधे कमरे, छह बसैरों वाली अनगिनत घरें बिछीं हैं बेधुले कपड़ो की गठरी सी, कुछ खाट धुप सेकते इंसानो के साथ बेसुध पड़े सड़क के नाम पर धुरमुसा रास्ता इक पत्थरी सी हिदायतें ना गुजरने की  ता...

ग़ज़ल

मंदिर मस्जिद की आग में इंसान  क्यों जलाते हैं |   आओ अपने अपने दिल में पहले इक राम बसाते हैं | मशालों की जरुरत नहीं तख्ता पलटने के लिए  कुछ शब्द चुनते है, दुष्यंत सी कविता बनाते हैं | नज़र घुमाओ जिधर, गर तुम्हे सब चोर दीखते हैं आओ अपने अपने घर में इक आइना लगाते हैं सच का फासला दो  चार कदम बस   और है      आपने पी भी नहीं, फिर क्यों लड़खड़ाते हैं |        तमन्ना हो तुम्हे जो फैज़ फ़राज़ सा नामवर होने की आओ जरा   उनकी काटों भरी जीवनी पढ़ जाते हैं | क्रांतियों को मुकम्मल होने में गुजर जाते हैं बरसों   इक काम करते हैं, आज एक पौधा लगाते हैं |      परेशान जो तुम हालात देख सीरिया की, रोहिंग्या की आओ अपने घरों के आगे एक प्याऊ बनाते हैं | ये जो ज़िद पे हो बैठे दुनिया बदलने की आओ घर लौट चलें, इक दिया जलाते हैं | ( नामवर - प्रतिष्ठित )

कहानी - मौलवी साहेब

सलामपुर में हमारे किराये वाले मकान के दो माले नीचे ग्राउंड फ्लोर पर मौलवी साहेब रहते थे | अपने तीन बेटे, २ बहुएँ, २ पोते और आधे दर्ज़न बकरियों के साथ रहने वाले मौलवी साहेब को अगर किसी चीज़ का शौक़ था, तो सुनने का | कुछ भी सुन लेते थे, कुमार सानू के गाने, चौराहे के पनवारी की उधार में खाये धोखों के किस्से, सुनील के मैट्रिक के परीक्षा में चौथी बार फेल होने में उसके टीचरों की मिलीभगत, अपनी बकरियों के भूखे होने पर मिमियाने के आवाज़ें और वो सब कुछ जिसे हम आप सुनकर अनसुना कर दें | आँखें नहीं थी उनकी, शायद इसलिए जो बात हम चेहरे के भावों से पढ़ते हैं उन्हें वो आवाज़ की कम्पन से पढ़ने की कोशिश करते थे | इसलिए शायद बड़ी गंभीरता से हर एक शब्द सुनते थे और कुछ कम सुनने पर 'माफ़ कीजियेगा' कहकर दुबारा दुहराने को कहते थे | उनकी इन्ही आदतों ने उन्हें मोहल्ले का वो पादरी बना दिया था जिसके पास हम अपनी कारस्तानियां सुनाने जाते हैं | हालांकि यहाँ ज्यादातर लोग अपनी तरफदारी और दूसरों की शिकायतें सुनाने आते थे | मौलवी साहेब फिर भी सब सुनते थे | कोई फैसला या सलाह नहीं देते, बस मिजाज से सुनते थे | कई लोग म...