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Showing posts from February, 2018

कहानी - सल्फास

बारिश आज भी झांसा दे गयी | मंगरु अपने पौने २ कट्ठे खेत की मेढ़ पर बैठ अलसाई नज़रों से कभी अपने सूखती फसलों को देखता तो कभी उँगलियों की टोपी बना आसमाँ की तरफ | अगस्त का महीना आ चुका था लेकिन बारिश की दूर दूर तक कोई खबर नहीं | मंगरु ने नज़र घुमाई तो अखबार के फटे हुए एक टुकड़े पे गयी | बड़े साफ़ मोटे अक्षरों में लिखा था 'किसानों का 35 हज़ार करोड़ का क़र्ज़ माफ़' | मंगरु ने अखबार का टुकड़ा तह कर अपनी जेब में डाला और घर की तरफ दोपहर का खाना खाने निकल पड़ा | शाम ढले अपने पडोसी सुखीराम से उसके बेटे को दिल्ली में फ़ोन कराया | सुखीराम का बेटा दिल्ली में बैंक परीक्षा की तैयारी करता था और गांव के होशियारों में शुमार था | पता चला की क़र्ज़ माफ़ी केवल बैंक से लिए कर्ज़ों पर है | मंगरु ने तो महाजन से पैसे लिए थे, तीन टका महीने के ब्याज पर | मंगरु को अपने तंग हालत से बहार आने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था | पिछले चंद दिनों में उसने ईंट भट्टी से लेकर मनरेगा तक हर जगह काम ढूंढने की कोशिश की, मगर कहीं काम ना बना | महाजन के सूध के पैसे भी बढ़े जा रहे थे | मंगरु इन्ही स...

रास्ते बदले हैं कभी?

रास्ते बदले हैं कभी? इस डर से की तंग इक गली में चंद लोग रहते हैं जो राह गुजरते पूछ बैठते हैं हाल चाल अक्सर | वक़्त वही, अंदाज़ वही चेहरा वही, अलफ़ाज़ वही, फ़िक्र्मन्दगी की आड़ में सवालों के बाण तैयार, हर सवाल यक़्साँ फरेबी (यक़्साँ - एक जैसे) हर सवाल इक बलात्कार | कभी किसी मसले का हल होता नहीं देखा इस संवाद से ना तल्खियां मिटती मोहल्ले की ना जड़ मिटते फसाद के | मंसूबे जो समझ नहीं पाता सवालों में छुपे सवाल का नामुनासिब कुछ कह जाता हूँ मच जाता अक्सर बवाल सा | वहीं दूसरी इक गली में जो और भी संकरी है मोहल्ले के मनुवादी जिसे अछूतों की टोली बता दुत्कार देते हैं | यों तो क्रांतियों वाला ज़ज्बा नहीं, मुँह चिढ़ाने के इरादे सही उसी गली से गुजर हम भी अपने प्रतिष्ठित मोहल्ले को ललकार लेते हैं | अधमरे एक नाले के दोनों तरफ आधे कमरे, छह बसैरों वाली अनगिनत घरें बिछीं हैं बेधुले कपड़ो की गठरी सी, कुछ खाट धुप सेकते इंसानो के साथ बेसुध पड़े सड़क के नाम पर धुरमुसा रास्ता इक पत्थरी सी हिदायतें ना गुजरने की  ता...