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Showing posts from July, 2018

इश्क़: प्रैक्टिकल वाला

अगस्त का पहला इतवार दोपहर के साढ़े तीन बजे काले घने बादलों में दिन कहीं ढक सा गया है सड़कें बारिश में वीरान सबकुछ मानो थम सा गया है घर की पोर्च पर मैं चाय की चुस्कियों के साथ अमृता प्रीतम की आत्मकथा के घूँट लगाता किताब के ४४वें पन्ने पर पहुँचता हूँ अमृता साहिर के लिए कहती हैं "तेरा मिलना ऐसा होता है जैसे कोई हथेली पर एक वक़्त की रोटी रख दे" इस मार्मिक प्रेम कथा से प्रभावित भीगती वीरान सड़कों पर बारिश में काल्पनिक फिल्म का सेट लगा देता हूँ मेरे कुशल निर्देशन में साहिर अमृता को मिलाने की कवायद शुरू होती है किसी सपने की तरह साहिर भीगते हुए धीमे क़दमों से अमृता की तरफ बढ़ते हैं एकटक उन्हें देखते हुए दोनों हाथ अपने हाथों में थामकर कुछ कहने को होंठ फड़फड़ाते हैं इक अनचाही आवाज़ से लेकिन सपना टूट जाता है बेमन से फ़ोन पर नज़रें फेरता हूँ बॉस का व्हाट्सएप्प: "कैन यू रीच ऑफिस इन हाफ ऍन ऑवर" आशिक़ मन झुंझलाता है ये वक़्त नहीं इन बेतुकी बातों का अभी इतिहास बन रहा है दो प्रेमी जो दशकों से न मिल पाए, एक होने जा रहे हैं...

स्वेटर

कल बारिश हुई अक्टूबर की पहली सर्द हवाओं की पहली झोंक में जब सिहरता देख मुझे उँगलियाँ तुम्हारी ऊन के गोलों पे तेज हो जाती थी चाय के प्यालों की खनक दूर से सुनकर तलब तुम्हारे गर्माहट की मीरे सीने में भर आती थी बादलों में टंगे सूरज की किरणें हिचकिचाते हुए नंगे ठूठ पेड़ों से गुजरकर ख़ुश्क हमारे बदन को सहला जाती थी कल फिर वही बारिश थी पतझड़ की पहली सिहरता रहा मैं तीसरे पहर रात के कुछ हरारत में ( हरारत - हल्का बुखार ) कुछ बनावटी, आँखें मूँद इंतजार में लिपट जाने को गर्म साँसों में तुम्हारे पड़े हैं गोले उलझे रिश्तों के, झाँकते बंद अलमीरों से स्वेटर जो बुन दो तुम फिर इक बार ओढ़ लूँ उसे सो जाऊँ मैं |